
सागर./शबरी पूर्व जन्म में रानी दयावती थी। कुंभ स्नान के समय रानी दयावती के पति उन्हें कुंभ में स्नान करने से मना कर दिया करते थे, कि तुम रानी हो भजन नही कर सकती। इस बात से दुखी होकर रानी गंगा में जल समाधि ले लेती है।
अगले जन्म में शबरी भील समुदाय मे जन्म लेती है। 6 वर्ष की आयु में विवाह होने के समय पशुओं की बलि दी जानी होती है, जिसका वो विरोध करती है और घर छोड़कर चली जाती है। भटकते भटकते मतंग ऋषि के आराम में पहुँच जाती है। मलग ऋषि उन्हें अपनी शिष्या बना लेते हैं। ऋषि उनसे बोलते है कि आप मेरे पास ही रहो एक दिन तुमको श्री राम के दर्शन होगे। अपने गुरु की बात मानकर शबरी अपना सारा जीवन प्रभु श्री राम की प्रतीक्षा में व्यतीत कर देती है।
जब एक दिन प्रभु श्रीराम माता सीता को खोजते हुए ऋषि मतंग के आश्रम पहुँचते है तो शबरी उन्हें सुग्रीव का पता बताती है और भक्तिवश श्री राम को अपने झूठे बेर खिलाती है, प्रभु श्री राम भाव विभोर होकर वह बेर खाते है। अंत में सबरी मोझ को प्राप्त होती है और महायोगिनी की उपधि से युगो युगो तक सम्मानित होती है।
शबरी लीला में 20 चरित्र है, जिसे लोकरंग समिति सतना के कलाकारों ने अपने अभिनय से चरितार्थ किया है। इस चरित्र की निर्देशिका सबिता दाहिया ने किया है, जो नाट्य कला से मास्टर्स करते हुए रंगमंच से कई वर्षों से सक्रिय है, उन्हें शिखर सम्मान, संगीत नाटक अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया है। इन्होनें 77 छोटे बड़े नाटको का निर्देशन किया है। आदिवासी संस्कृति पर आधारित वनवासी लीला के पूरे प्रदेश में मंचन किये गये है। मंचन के मुख्य कलाकार अनामिका, पूजा, श्रेया, हर्षिता, दिव्यांश, हर्ष, अखिलेश, सुरेन्द्र, देवेश, आदि है।



